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उत्तराखंड कर्मचारियों की मांग: एक राष्ट्र, एक वेतन-पेंशन लागू हो!

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने आठवें वेतन आयोग के गठन से पहले शासन को महत्वपूर्ण सुझाव सौंपे हैं, जिसमें पूरे देश में समान कार्य के लिए समान वेतन की वकालत की गई है। परिषद के अध्यक्ष अरुण पांडे का कहना है कि महंगाई और बढ़ती लागत को देखते हुए फिटमेंट फैक्टर को 3.68 किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, कर्मचारियों ने मांग की है कि केंद्र और राज्य के कर्मचारियों के बीच के अंतर को खत्म कर ‘एक राष्ट्र, एक वेतन और एक पेंशन’ की अवधारणा को साकार किया जाए।

दुर्गम सेवा और पर्वतीय भत्तों में बढ़ोत्तरी की मांग

परिषद ने विशेष रूप से उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पर्वतीय विकास भत्ते को एक निश्चित राशि के बजाय बेसिक पे का 10 से 15 प्रतिशत करने का सुझाव दिया है। साथ ही, अत्यधिक दुर्गम क्षेत्रों में तैनात कर्मचारियों के लिए ‘विशेष कठिन सेवा भत्ता’ और उनके बच्चों के लिए हॉस्टल सब्सिडी की भी मांग की गई है ताकि कठिन क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मियों को उचित प्रोत्साहन मिल सके।

पुरानी पेंशन योजना और वेतन विसंगति पर सुझाव

कर्मचारियों ने 1 अप्रैल 2005 से बंद की गई पुरानी पेंशन व्यवस्था को फिर से बहाल करने की पुरजोर मांग की है। इसके अलावा, वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए ग्रेड-पे 1800 को समाप्त कर न्यूनतम ग्रेड-पे 2000 करने और ग्रेड-पे 4600 व 4800 के पदों का विलय करने का प्रस्ताव दिया गया है। परिषद ने यह भी सुझाव दिया है कि 65 वर्ष की आयु से ही पेंशन में 5% की वृद्धि की जाए और पेंशन कम्युटेशन की वसूली अवधि को 15 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष किया जाए।

कैशलेस चिकित्सा और पदोन्नति के अवसर

राज्य के कर्मचारियों के लिए केंद्र की तर्ज पर पूर्णतः कैशलेस और निःशुल्क चिकित्सा सुविधा की मांग की गई है। परिषद ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि महंगाई भत्ते और चिकित्सा प्रतिपूर्ति को आयकर (Income Tax) से मुक्त रखा जाए। पदोन्नति के सीमित अवसरों को देखते हुए, सुनिश्चित करियर प्रोन्नयन (ACP) के लाभ 7, 14 और 21 वर्ष की सेवा पर देने का सुझाव दिया गया है। अंत में, शासन से अनुरोध किया गया है कि जब वेतन आयोग उत्तराखंड आए, तो परिषद को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त समय दिया जाए।

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