उत्तराखंड

MBBS छात्रों के लिए 3 गुना महंगी होगी पढ़ाई! जानिए उत्तराखंड मेडिकल शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव

देहरादून।उत्तराखंड के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई करने वाले एमबीबीएस छात्रों के लिए अनिवार्य बॉन्ड व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने की तैयारी की जा रही है। चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, राज्य में हर साल बड़ी संख्या में डॉक्टर तैयार होने के कारण अब पहाड़ों पर बॉन्ड के तहत तैनाती के लिए पद सीमित हो गए हैं। इस बड़े नीतिगत बदलाव का सीधा असर प्रदेश के भावी मेडिकल छात्रों, उनकी फीस और स्वास्थ्य विभाग के प्रशासनिक ढांचे पर पड़ेगा।

स्वास्थ्य विभाग की पुरानी नीति के तहत मेडिकल छात्रों को केवल 50 हजार रुपये सालाना फीस पर पढ़ाई का मौका मिलता था, जिसके बदले उन्हें अनिवार्य रूप से 5 साल तक पहाड़ी अस्पतालों में सेवाएं देनी होती थीं। हालांकि, डॉक्टरों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में जाने में रुचि न दिखाने पर इस अवधि को घटाकर पहले 3 साल किया गया और फिर इसे मैदान के कॉलेजों से हटाकर केवल पहाड़ के कॉलेजों तक सीमित कर दिया गया था। अब सरकार इस व्यवस्था को पूरी तरह बंद करने पर विचार कर रही है, जिसके बाद छात्रों को 50 हजार की जगह 1.5 लाख रुपये सालाना फीस चुकानी होगी।

मेडिकल कॉलेजों में बॉन्ड खत्म करने की सबसे बड़ी वजह राज्य में स्वीकृत पदों का भर जाना है। वर्तमान में उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों से हर साल 1200 से अधिक नए एमबीबीएस डॉक्टर बनकर निकल रहे हैं। इसके विपरीत, राज्य में स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत मेडिकल अफसर के कुल स्वीकृत दो हजार पद लगभग पूरे भर चुके हैं। ऐसे में नए पास आउट डॉक्टरों को बॉन्ड के तहत पहाड़ों पर तैनात करने के लिए खाली जगह ही नहीं बची है।

एक तरफ जहां एमबीबीएस स्तर पर बॉन्ड समाप्त किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पीजी डॉक्टरों के लिए यह व्यवस्था आगे भी लागू रहेगी। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 50 फीसदी पद अब भी खाली पड़े हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए पीजी स्तर पर बॉन्ड जारी रखना अनिवार्य माना गया है।

चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने स्पष्ट किया कि एमबीबीएस डॉक्टरों की संख्या अब राज्य की जरूरतों के सापेक्ष संतुलित हो चुकी है। ऐसे में सीमित पदों को देखते हुए बॉन्ड व्यवस्था को समाप्त करना ही व्यावहारिक कदम है। सरकार का मानना है कि इस फैसले से मेडिकल शिक्षा प्रणाली और राज्य के बजट प्रबंधन में नया संतुलन कायम होगा।

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